Sunday, October 9, 2011

Dussehra Special

रामायण में भगवन श्री राम ने जब सीता का अनिच्छा से परित्याग किया तब उन्हें तरह तरह के विचार
रातों में घेर लेते थे और उन्हें नींद नहीं आती थी उन विचारों को काल्पनिक रूप से सृजित करके दशहरे पर
पेश कर रहा हूँ !!!! आशा करता हूँ पढ़कर मुझे अनुग्रहित करेंगे !!


लोकभय जन अपवादों से मैंने तुम्हारा परित्याग किया !
पति सम्मान जानकर हे जानकी तूने यह स्वीकार किया !
जनक दुलारी हे प्राण प्यारी मैंने क्या अपराध किया !
राज धर्म निभाने के लिए पति का धर्म त्याग दिया !

तुम हो मेरी जान जानकी तुमसे ही ये जहां है !
जो तुम सह रही हो वहां वह मैंने भी यहाँ सहा है !
चित्त हमेशा अशांत है तुम्हारी कुशलता को सोचकर !
आम इंसान ही बेहतर है क्या पाया राजा राम हो कर !

राज प्रासाद से तुम्हारे चरण गए, अब रोनक भी यहाँ कहाँ है ?
वन की तपिश अब दूर हुई स्वर्ग ही अब वहां है !
राजा होकर भी विवश हूँ तुमसे कुछ लेने में !
दासी होकर भी सक्षम हो तुम मुझ को सब कुछ देने में!

हे निद्रा ! अब जल्दी आजा तू क्यूँ रोब दिखाती है ?
हार चुका हूँ एक बार फिर बार बार क्यूँ हराती है ?
में विवश हूँ कितना मुझे ये बार बार बतलाती है !
सृष्टि भी देखो कैसी है ? मेरे साथ खेल रचाती है !!

दीपसृजन

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