सृजन में एक कविता दशहरा विशेष के रूप में मैंने आप लोगो
के समक्ष प्रस्तुत की थी ! उसी कविता का स्मरण जब सीताजी को
आभास से होता है तो उत्तर के रूप में ये वचन अवतरित होते हैं
पढकर अनुग्रहित कीजियेगा !!!!
हे नाथ विरहाग्नि में आप भी जले विरहाग्नि को मैंने भी सहा
हे नाथ विरहाग्नि में आप भी जले विरहाग्नि को मैंने भी सहा
शरीर मेरा यहाँ रहा पर चित्त तो सदा आपकी कुशलता में रहा
अपराध आपका नहीं ये तो नियति की रचना है
राम सिया के जीवन में ये दुःख का फल भी पकना है
वन की शोभा भी है नाथ अब कहा प्रफुल्लित करती है
पुष्प की कलियाँ भी अब इस विरहाग्नि में जलती हैं
क्या प्रयोजन उन राज प्रासादों का जब आपकी आत्मा ही नहीं वहां है ?
क्या लाभ उस जीवन का जिसमे राम विहीन जहां है ??
अभाव आपका चिंतन आपका ये जीवन भी आप में लगा है
सब हो कर भी नहीं है साथ आपका यही तो सदा खला है
चिंतित न हो हे नाथ बार बार हमारा मिलन निश्चित है
में आपके हृदय में हूँ आप मुझसे कहा वंचित हैं??
हे विचार तुम क्यूँ नहीं जाते क्यूँ मुझको यूँ रुलाते हो
प्रबल हो गए हो तुम ये सोच कर बहुत इठलाते हो
मेरे राम की शक्ति से तुम परचित क्यूँ नहीं हो जाते हो
इतना गुरूर है तो क्यूँ नहीं मुझे राम से मिलाते हो
दीपसृजन
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