गणतंत्र दिवस और शहीद दिवस दोनों ही निकल चुके हैं ! !! इन राष्ट्रीय पर्वों के उपलक्ष में
मैं आपके सामने उस कविता का पेश कर रहा हूँ जिसे मैंने लगभग तीन वर्ष पूर्व लिखा था
मानसिक अपरिपक्वता का होना स्वाभाविक है !!!!!!
अतः दो पल के लिए इस पर नज़रें डालकर मुझे अनुग्रहित करें
मैं आपके सामने उस कविता का पेश कर रहा हूँ जिसे मैंने लगभग तीन वर्ष पूर्व लिखा था
मानसिक अपरिपक्वता का होना स्वाभाविक है !!!!!!
अतः दो पल के लिए इस पर नज़रें डालकर मुझे अनुग्रहित करें
शहीदों की शहादत की स्मृतियाँ एवं किस्से मुझे याद आ जाते हैं
जब हम कोई राष्ट्रीय त्यौहार या शहीद दिवस मनाते हैं भूले हैं आज हम यहाँ इस विकसित राष्ट्र में उनकी परिकल्पनाएं
धूमिल हैं आज यहाँ उनका बलिदान और उनकी रक्त निर्मित अल्पनायें
विस्मरणीय हो गयी हैं आज उनकी बातें , उनके विचार
परिपक्व कहकर स्वयं को, कर रहे हैं हम आधुनिकता का प्रसार
फिर आज हम क्यूँ इस तथ्य को नहीं अपनाते हैं
शहीद हमे जब ही क्यूँ याद आते हैं जब हम कोई राष्ट्रीय त्यौहार मनाते हैं
बापू की अहिंसा, नेताजी का वो जोश
बापू की अहिंसा, नेताजी का वो जोश
चाचा का अपनत्व, रानी का वो वीर उद्घोष
चंद्रशेखर की आजादी, भगत सिंह का बलिदान
सावरकर की वीरता , तात्या की वो शान
अपने भासनो में बाद चढ़ के फरमाते हैं
शहीद हमे जब ही क्यूँ याद आते हैं जब हम कोई राष्ट्रीय त्यौहार मनाते हैं
पाश्चात्य संस्कृति को गृहण कर हम स्वयं को विकसित समझ रहे हैं
इसके विपरीत लोग विदेशों में भारतीयता को आत्मसात कर रहे हैं
हमारी श्रेष्ठता और अखंडता क्यूँ अपनी राह खो रही है
और क्यूँ विकास के नाम पर मात्र बर्बादी हो रही है
इसके मायने मुझे आज तक समझ नहीं आते हैं
शहीद हमे जब ही क्यूँ याद आते हैं जब हम कोई राष्ट्रीय त्यौहार मनाते हैं
इस सब के पश्चात भी सदेव आशा की किरण व्याप्त है
विकसित होंगे आदर्शों के साथ ये ख्याल साथ है
इतना कुछ करने के बाद में करना चाहता हूँ एक काम
इतना कुछ करने के बाद में करना चाहता हूँ एक काम
हम सभी को सुनहरा कल देने वाले समस्त शहीदों को मेरा सहृदय प्रणाम !!
दीपसृजन
दीपसृजन