Tuesday, January 31, 2012

Happy Republic Day


गणतंत्र  दिवस और शहीद दिवस दोनों ही निकल चुके हैं ! !! इन राष्ट्रीय पर्वों के उपलक्ष में
मैं आपके सामने उस कविता का पेश कर रहा हूँ जिसे मैंने लगभग तीन वर्ष पूर्व लिखा था
 मानसिक अपरिपक्वता का होना स्वाभाविक है !!!!!!
अतः दो पल के लिए इस पर नज़रें डालकर मुझे अनुग्रहित करें 

शहीदों की शहादत की स्मृतियाँ एवं किस्से मुझे याद आ जाते हैं 
जब हम कोई राष्ट्रीय त्यौहार या शहीद दिवस मनाते हैं 

भूले हैं आज हम यहाँ इस विकसित राष्ट्र में उनकी परिकल्पनाएं 
धूमिल हैं आज यहाँ उनका बलिदान और उनकी रक्त निर्मित अल्पनायें 
विस्मरणीय हो गयी हैं आज उनकी बातें , उनके विचार 
परिपक्व कहकर स्वयं को, कर रहे हैं हम आधुनिकता का प्रसार 
फिर आज हम क्यूँ इस तथ्य को नहीं अपनाते हैं 
शहीद हमे जब ही क्यूँ याद आते हैं जब हम कोई राष्ट्रीय त्यौहार मनाते हैं

बापू की अहिंसा, नेताजी का वो जोश 
चाचा का अपनत्व, रानी का वो वीर उद्घोष 
चंद्रशेखर की आजादी, भगत सिंह का बलिदान 
सावरकर की वीरता , तात्या की वो शान 
अपने भासनो में बाद चढ़ के फरमाते हैं 
शहीद हमे जब ही क्यूँ याद आते हैं जब हम कोई राष्ट्रीय त्यौहार मनाते हैं 

पाश्चात्य संस्कृति को गृहण कर हम स्वयं को विकसित समझ रहे हैं 
इसके विपरीत लोग विदेशों में भारतीयता को आत्मसात कर रहे हैं 
हमारी श्रेष्ठता और अखंडता क्यूँ अपनी राह खो रही है 
और क्यूँ विकास के नाम पर मात्र बर्बादी हो रही है 
इसके मायने मुझे आज तक समझ नहीं आते हैं 
शहीद हमे जब ही क्यूँ याद आते हैं जब हम कोई राष्ट्रीय त्यौहार मनाते हैं 

इस सब के  पश्चात भी सदेव आशा की किरण व्याप्त है 
विकसित होंगे आदर्शों के साथ ये ख्याल साथ है
इतना कुछ करने के बाद में करना चाहता हूँ एक काम 
हम सभी को सुनहरा कल देने वाले समस्त शहीदों को मेरा सहृदय प्रणाम !!

दीपसृजन 




Monday, January 9, 2012

Ramayan Influence

 सृजन में एक कविता दशहरा विशेष के रूप में मैंने आप लोगो 
के समक्ष प्रस्तुत की थी ! उसी कविता का स्मरण जब सीताजी को 
आभास से होता है तो उत्तर के रूप में ये वचन अवतरित होते हैं 
पढकर अनुग्रहित कीजियेगा !!!!

हे नाथ विरहाग्नि में आप भी जले विरहाग्नि को मैंने भी सहा 
शरीर मेरा यहाँ रहा पर चित्त तो सदा आपकी कुशलता में रहा 
अपराध आपका नहीं ये तो नियति की रचना है 
राम सिया के जीवन में ये दुःख का फल भी पकना है 

वन की शोभा भी है नाथ अब कहा प्रफुल्लित करती है 
पुष्प की कलियाँ भी अब इस विरहाग्नि में जलती हैं 
क्या प्रयोजन उन राज प्रासादों का जब आपकी आत्मा ही नहीं वहां है ?
क्या लाभ उस जीवन का जिसमे राम विहीन जहां है ??

अभाव आपका चिंतन आपका ये जीवन भी आप में लगा है 
सब हो कर भी नहीं है साथ आपका यही तो सदा खला है 
चिंतित न हो हे नाथ बार बार हमारा मिलन निश्चित है 
में आपके हृदय में हूँ आप मुझसे  कहा वंचित हैं??

हे विचार तुम क्यूँ नहीं जाते क्यूँ मुझको यूँ रुलाते हो 
प्रबल हो गए हो तुम ये सोच कर बहुत  इठलाते हो 
मेरे राम की शक्ति से तुम परचित क्यूँ नहीं हो जाते हो 
इतना गुरूर है तो क्यूँ नहीं मुझे राम से मिलाते हो 

दीपसृजन