ये ज़िन्दगी उम्र में कुछ वर्ष जोड़ते जा रही है
जाने कितनी यादें और शरीर से साथ छोडती जा रही है
कुछ दुखमयी यादें जो दिल खुश कर जाती हैं
कुछ प्रफुलित स्मृतियाँ जो आँखें आंसुओं से भर जाती हैं
वो लड़कपन वो बचपन कि सहजता कहाँ खो गयी है ?
युवा बनाकर क्या सोच और क्या उद्द्देश्य दे गयी है !
अनुभवों का बंटवारा और मामलों कि अनिजता कहाँ सो गयी है ?
स्वार्थ और अहं कि भावना क्यूँ प्रसून हो गयी है ?
यादों कि कश्ती को खेने वाले भी आप हैं
इस अनोखे सफ़र का मजा लेने वाले भी आप हैं
हजारों कमाकर भुगतान करने में असमर्थ भी आप हैं
थोडा समय खर्च कर कमाने वाले भी आप हैं
क्यूँ न याद करूँ उन यादों को
क्यूँ न याद करूँ उन यादों को
जो मन में मिठास घोलते जा रही हैं
ये ज़िन्दगी भी उम्र में कुछ वर्ष जोड़ते जा रही है
दीपसृजन
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