तेरे कारण ऐसी महक है ये
तुझ में जी लूं में हरेक पल
भूल जाऊं क्या था में कल
१ हरेक लम्हा मुझ पे वार दे
ज़िन्दगी ये संवार दे
एक हसीं ख्वाब बनकर तू हर दम दिखे
कट जाये रातों का ये लम्बा सफ़र
मुझ में खोजा तू इस कदर
भूल जाऊं क्या था में कल
२ मेरी छाया बनकर तू दिन भर चले
रात और दिन मेरे तुझ संग ढले
तू ही मेरे अब दोनों जहां
तुझ बिन मेरा ये जीवन कहाँ
मुझमे समाजा तू इस कदर
भूल जाऊं क्या था में कल
तेरे कारण ऐसी महक है ये
आँखों में अब मेरे चमक है
तुझ में जी लूं में हरेक पल
भूल जाऊं क्या था में कल
नई उम्र की यह नई फसल सुन्दर है ।
ReplyDeleteआपको मेरी रचनायें थोड़ी अच्छी लग जाती है यही मेरे लिए एक
ReplyDeleteपुरस्कार है वैसे ये किसी गीत के सृजन का प्रथम अवसर है और आपको
इसका सौंदर्य अच्छा लगा अत: प्रसन्न हूँ
आपकी कमेन्ट में बहुत गहराई प्रतीत हो रही है भविष्य में मेरी लघुकथा को समय देकर आप मुझे अनुग्रहित करेंगी
इसी आशा के साथ पुनः धन्यवाद
दीपेन्द्र