Friday, May 20, 2011

मैंने महाविद्यालयओं में आधुनिकता का प्रभाव अति शीग्रता से अनुभव किया है उन्ही सर्वेक्षणों के आधार पर प्रथम लघुकथा को लिखा है "अनोखे रिश्ते " परीक्षा कि व्यस्तता के कारण अभी उसे टाइप नहीं कर पा रहा हूँ परन्तु उसी लघुकथा में से एक गीत जो मेरा प्रथम प्रयास है को पेश कर रहा हूँ




आँखों में अब मेरे चमक है 
तेरे कारण ऐसी महक है ये 
तुझ में जी लूं में हरेक पल 
भूल जाऊं क्या था में कल 

१ हरेक लम्हा मुझ पे वार दे 
ज़िन्दगी ये संवार दे 
एक हसीं ख्वाब बनकर तू हर दम दिखे 
कट जाये रातों का ये लम्बा सफ़र 
मुझ में खोजा तू इस कदर 
भूल जाऊं क्या था में कल 

२ मेरी छाया बनकर तू दिन भर चले 
 रात और दिन मेरे तुझ संग ढले 
  तू ही मेरे अब दोनों जहां 
 तुझ बिन मेरा ये जीवन कहाँ 
 मुझमे समाजा तू इस कदर 
 भूल जाऊं क्या था में कल 

तेरे कारण ऐसी महक है ये 
आँखों में अब मेरे चमक है 
तुझ में जी लूं में हरेक पल 
भूल जाऊं क्या था में कल 

2 comments:

  1. नई उम्र की यह नई फसल सुन्दर है ।

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  2. आपको मेरी रचनायें थोड़ी अच्छी लग जाती है यही मेरे लिए एक
    पुरस्कार है वैसे ये किसी गीत के सृजन का प्रथम अवसर है और आपको
    इसका सौंदर्य अच्छा लगा अत: प्रसन्न हूँ
    आपकी कमेन्ट में बहुत गहराई प्रतीत हो रही है भविष्य में मेरी लघुकथा को समय देकर आप मुझे अनुग्रहित करेंगी
    इसी आशा के साथ पुनः धन्यवाद
    दीपेन्द्र

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