माँ माता जननी मम्मी तेरे संबोधन अपार हैं
तेरी दुआओं से ही तो मेरा यह सुखद संसार है
हम तेरे बच्चे तेरी ही तो छाया हैं माँ
दुःख सहकर भी ख़ुशी देती ऐसा तेरा व्यव्हार है माँ
मेरी गलतियों को हसकर टाल देती यही तो तेरा प्यार है माँ
नारी से बढकर बहुत अधिक तू ही तो मेरा संसार है माँ
अंततः बस इतना ही करना चाहता हूँ काम
मुझे यह संसार दिखाने वाली ऐ परम शक्ति तुझे मेरा शत शत प्रणाम
-Deepsrijan
दीपेन्द्र ,सबसे पहले तो मैं लघुकथा को इतने ध्यान से पढने व टिप्पणी करने के लिये धन्यवाद । आपकी तीन कविताएं पढी । इतना कह सकती हूँ कि आप लिखना जारी रखें क्योंकि बात को गहराई से पकडने की आप में क्षमता है । साथ ही संवेदनामय अनुभूति भी है जो आपकी तीनों कविताओं में दिख रही है । लिखते रहिये ।
ReplyDeleteसर्वप्रथम आपको धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ में एक १९ वर्षीय विद्यार्थी हूँ इस कारण नियमितता के साथ अपनी कविताओं को अपलोड नहीं कर पाता और हाँ आप मुझे आप कहकर संवोधित न करे
ReplyDeleteमुझे बहुत विचित्र लगता है! आपका मार्ग दर्शन सदेव वाछ्नीय है! मेरे सृजन के संसार में सदेव आपकी आवश्यकता है
दीपेन्द्र